ज़माना बदल गया है …………..

जमीन है छोटी सी,
आसमान भी सिकुड़ गया है,
रेत के धोरों में है ठंडक,
बर्फ का ढेला भी,
पिघल गया है,
ये इस बात का है सबूत,
कि ज़माना बदल गया है ………….
कहानियों में,
किरदार हैं खो गए,
वक्त में से,
पल पल गया है,
किस्से हो गए हैं पुराने,
एक फसाना चल गया है,
ये इस बात का है सबूत,
कि ज़माना बदल गया है …………..
पास होकर भी,
दूर रहते हैं लोग,
बस कहने को ही,
फोन की मदद से,
दूर होकर भी,
पास रहते हैं लोग,
अब सबको अपना अपना,
रास्ता मिल गया है,
ये इस बात का है सबूत,
कि ज़माना बदल गया है ………………

एक छोटे से ………………….

एक छोटे से,
सवाल पर,
क्यों हुआ इतना बवाल,
बात छोटी सी जो पूछी,
तो लोग,
क्यों हुए बेहाल,
लोग चाहते हैं,
मैं उनकी किसी बात का,
जवाब न दूं,
और पूछता रहूं,
उनकी ज़िन्दगी के हाल,
एक छोटे से ………………….
मुझे ज्यादा बोलने की,
आदत तो है नहीं,
मैं बस काम की ही,
बात करता हूं,
इसी लिए कभी न कभी,
मेरी किसी न किसी बात पर,
होता है कमाल,
एक छोटे से ………………….
मैं ठोक बजा कर ही,
बात करता हूं,
मुझे मेरी किसी बात का,
नहीं है कोई मलाल,
एक छोटे से ………………….

ऐ ज़िन्दगी …………………….

ऐ ज़िन्दगी,
तुझसे जवाब चाहिये,
कुछ बीते हुऐ,
लम्हों का हिसाब चाहिये,
है चाहत बस,
छोटी सी मेरी,
कि जो गुज़र गये,
इस दुनिया से,
मेरे अपने,
बस कुछ पल के लिये,
उनका साथ उधार चाहिये,
ऐ ज़िन्दगी …………………….
बहुत पढ़ ली,
मोटी मोटी किताबें,
बड़े बड़े ग्रन्थ,
उलझ गयी है,
ज़िन्दगी झमेलों में,
क्या है इन सबका अर्थ,
अब जीवन को,
खुशियों की किताब चाहिये,
ऐ ज़िन्दगी …………………….

मैं हूं ……………………….

मैं हूं बहुत सुलझा सा,
पर चीज़ें उलझ जाती है,
दीया जलाने की,
कोशिश बहुत करता हूं,
पर लो बुझ जाती है,
सोचता हूं मैं,
कि चलूं अपने हिसाब से,
पर हालात कहते हैं,
तेरे ख्वाब,
क्यूं हैं बेताब से,
कोशिश कर रहा हूं,
जानने की,
कि चाहती क्या है ज़िन्दगी?
फिर भी ये पहैली,
नहीं समझ आती है,
मैं हूं ……………………….
घूमता हूं दर-ब-दर,
कि मिले कोई मुकाम,
पर ज़िन्दगी में,
शर्तें कुछ ऐसी हैं,
कि मंजिल नज़र आते ही,
राह भटक जाती है,
मैं हूं ……………………….

दो पल की ………………

दो पल की है,
ये ज़िंदगानी,
जी ले जरा,
वरना ये यूं ही,
बीत जानी,
कुछ रंग भर ले,
इस में तू,
वरना ऐसे तो बहुत,
Sad होगी ये कहानी,
दो पल की ……………………
क्यों है तू,
पसोपेश में,
जी रहा है तू,
किस भेष में,
क्यों पास,
रखता है तू परेशानी,
अंधेरे में न रह,
कर ले इसे,
थोड़ी नूरानी,
दो पल की ……………………
अकेला छोड़ देती है ये,
कभी परखने के लिये,
साथ उसी का,
देती है ये,
हार नहीं मानता जो,
ये है बड़ी सयानी,
दो पल की ……………………

ज़िन्दगी ………….. एक इम्तेहान

ज़िन्दगी एक इम्तेहान है,
यहाँ हर बार,
कसौटी पर खरा उतरना,
बड़ मुश्किल काम है,
पर हिम्मत से,
हर मुश्किल भी आसान है,
ज़िन्दगी ……………………….
हर कदम पर है दिक्कतें,
हर डगर पर है रुकावटें,
काम अगर सच्चे,
मन से करो,
तो सब परेशानियां,
लगती बड़ी कामरान है,
ज़िन्दगी ……………………….
मिट्टी से बना है इन्सान,
मिट्टी में ही मिल जायेगा,
कुदरत के सामने,
इन्सान की औकात कुछ नहीं,
फिर भी इंसान समझता,
खुद को बड़ा धनवान है,
ज़िन्दगी ……………………….
नाम में क्या रखा है,
दुनिया में काम ही,
इन्सान की पहचान है,
ये बात जानते हुये भी,
इन्सान नाम के लिये,
करता खुद को परेशान है,
ज़िन्दगी ……………………….

मुझे तो ………………………

मुझे तो खुद के,
सीधे-पन ने मारा,
लोगों की चालाकी में,
कहाँ दम था,
जमाना चलता है,
बोलने वालों के हिसाब से,
मैं बस बोलने में ही,
कम था,
लोग निकल गये,
बातें करते हुये,
वक्त से आगे,
मैं तो वक़्त का,
पाबन्द था,
मुझे तो ………………………
मुझे था लोगों पर,
भरोसा पूरा,
शायद मुझे,
यही वहम था,
मुझे तो ………………………
करना चाहिए था,
मुझे खुद पर भी,
थोड़ा यकीन,
सोचता हूं,
पहले थोड़ा पागल,
मेरा भी मन था,
मुझे तो ………………………

जाने क्यों ……………………

जाने क्यों एक ही घर में,
लोग साथ नहीं रहते,
पास रहते हैं,
फिर भी एक दूसरे की,
परेशानियों का,
एहसास नहीं करते,
जाने क्यों ………………………
दिखाते हैं,
चेहरे पर खुशी,
पर अंदर ही अंदर,
घुटते रहते हैं,
एक दूसरे से,
बांटते नहीं दु:ख,
जाने क्यों अपने ही,
घर में लोग,
अजनबियों की तरह रहते हैं,
जाने क्यों ………………………
दिल खोल के अब,
घर के लोग,
एक दुसरे से,
बात नहीं करते,
सभी लोग अपनी अपनी,
धुन में सवार रहते हैं,
इसी चार दीवारी को,
लोग ‘परिवार’ कहते हैं,
जाने क्यों ………………………

वक़्त ………………

वक्त़ निकल जाता है,
पर निशान,
छोड़ जाता है,
एक छोटा सा फैसला ही,
ज़िन्दगी को,
एक अलग राह पर,
मोड़ जाता है,
ज़िन्दगी में हर दिन,
कुछ होती हे शर्तें,
कभी चलते चलते ही,
कुछ लोगों से,
रिश्ता जुड़ जाता है,
वक़्त ……………………….
वक्त़ के साथ,
ज़िन्दगी में कुछ लोग,
आगे बढ़ जाते हैं,
कुछ पीछे,
छूट जाते हैं,
एेसे दौर में,
कुछ लोग,
अकेले रह जाते हैं,
पर जीवन रूकता,
कहां है,
ये तो चलता जाता है,
वक्त़ ……………………….

लहरों सा ……… जीवन

लहरों सा है जीवन,
कभी तूफान,
कभी शांति,
कभी है किसी के लिए तड़पन,
है मिजाज़ भी,
अलग ही ज़िन्दगी का,
कभी बहुत हल्का,
महसूस करता हूं,
कभी उलझ जाता है,
किसी बात में मन,
लहरों सा ………………………़
ज़िन्दगी एक दौर है,
कभी खुशी,
कभी गम का,
कभी उतार,
कभी चढ़ाव,
यही दस्तूर है जीवन का,
रहता नहीं,
एक जैसा वक़्त कभी,
मौसम कभी अच्छा रहता है,
कभी आँखों से,
बहता है सावन,
लहरों सा ……………………..

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